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Sunday, February 21, 2010

BACHPAN

कागजो की नाव बना कर
हाथो से चप्पू चला कर
हम मानो आज हार गए
और बचपन की बाजी
ये समय हमसे मार गए

तलाशना चाहा हमने अपने बचपन को
मिटटी के घरोंदो के अन्दर
पर सच तो ये है की
मर चूका है हमारे अन्दर का बन्दर

सदैव अग्रसर बनकर भी
पीछे मुड़ने का दिल चाहता रहा
और बड़ा कहलाना कम परन्तु
छुटा बचपन ज्यादा सताता रहा

असंतोष इस बात का है की
आत्मा ज्ञान की तृप्ति हमने पहले पा कर भी
बेवकूफी में हमने जल्दी बड़े होने की कसम खा ली थी...

1 comment:

  1. Hi

    Got your reference from Reena, Saw your writings..... You have awesome command. Just learn a bit of urdu..... You have potential....

    Dhoondhta hu tujhko kis badhawaasi se
    ae mere bachpan tu laut kyu nahi aata

    One more for you

    Wo din bhi kitne achchhe the
    Jab hum roya karte the
    Saara dard ashko.N me bahaa ke
    chain se soya karte the

    Keep writing

    All the best. Will check it again

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